Correlation क्या है इसका महत्व एवं इसके प्रकार

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Saurabh Guptahttp://karekaise.in
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Meaning and Definition of Correlation / सह-सम्बन्ध का आशय एवं परिभाषा


जब दो संख्यात्मक तथ्यों में, जिनमें आपस में कारण और परिणाम का सम्बन्ध हो, एक ही दिशा में या विपरीत दिशाओं में परिवर्तन हो तो ऐसे परिवर्तनों का मापन correlation कहलाता है।

डब्ल्यू, आई. किंग (W. I. King) के अनुसार, “सह-सम्बन्ध का अर्थ दो समंकमालाओं अथवा समंकों के समूह में कार्य-कारण सम्बन्ध (Cause and Effect relationship) का पता लगाना है।

एल. आर. कोनर (L. R. Connor) के अनुसार, “यदि दो या अधिक राशियाँ सहानुभूति में परिवर्तित हो जिसमें एक में होने वाले परिवर्तनों के फलस्वरूप दूसरी राशि में भी परिवर्तन होने की प्रवृत्ति पायी जाये, तो वे राशियाँ सह-सम्बन्धित कहलाती है।

प्रो. वॉडिंगटन (A. L. Boddington) के अनुसार, “जब कभी दो या अधिक समूहों अथवा वर्गों अथवा समकमालाओं में निश्चित सम्बन्ध विद्यमान हो, तो उनमें सह-सम्बन्ध का होना कहा जाता है।”

Importance of Correlation / सह-सम्बन्ध का महत्व


सांख्यिकीय विश्लेषण में सह-सम्बन्ध सिद्धान्त एवं तकनीक का बहुत महत्व है। इस सिद्धान्त के मूल तत्वों का प्रतिपादन सर्वप्रथम फ्रांस के खगोलशास्त्री ब्रावेश (Bravias) ने किया था, परन्तु विन्दुरेखीय रूप से सह-सम्बन्ध तकनीक का अन्वेषण सर्वप्रथम सर फ्रांसिस गाल्टन (Sir Francis (Galton) ने किया था। 1896 में प्रसिद्ध संख्याशास्त्री कार्ल पियर्सन (Karl Pearson) ने सह-सम्बन्ध गुणक (Co-oefficient of Correlation) द्वारा सह-सम्बन्ध ज्ञात करने की गणितीय विधि का प्रतिपादन किया। इन दोनों (गाल्टन तथा पियर्सन) ने इस तकनीक की सहायता से प्राणिशास्त्र (Biology) तथा जनन-विद्या (Genetics) की अनेक समस्याओं का विवेचन किया। अर्थशास्त्र में भी इस तकनीक का विशेष महत्व है। अर्थशास्त्र में सह-सम्बन्ध के उपयोग के बारे में नीसवेंजर (Neiswanger) लिखते हैं, “सह-सम्बन्ध विश्लेषण आर्थिक व्यवहार को समझने में योग देता है, विशेष महत्वपूर्ण चरों, जिन पर अन्य चर निर्भर करते हैं, को खोजने में सहायता देता है, अर्थशास्त्री भी उन सम्बन्धों को स्पष्ट करता है जिनसे गड़बड़ी फैलती है तथा उसे उन उपायों का सुझाव देता है जिनके द्वारा स्थिरता लाने वाली शक्तियाँ प्रभावी हो सकती है।” सह-सम्बन्ध की माप यह भी आश्वस्त करती है. कि सम्बन्धित चरों में आन्तरगणन तथा बाह्यगणन एवं पूर्वानुमान विश्वसनीय होगा सह-सम्बन्ध विश्लेषण पर आधारित पूर्वानुमान अधिक विश्वसनीय एवं वास्तविकता के निकट होते हैं।

Types of Correlation / सह-सम्बन्ध के प्रकार


परिवर्तनों के आधार पर सह-सम्बन्ध निम्न तीन प्रकार के होते हैं-

(1) धनात्मक और ऋणात्मक सह-सम्यन्ध – जब दो समंकमालाओं में एक ही दिशा में परिवर्तन हो अर्थात् एक समंकमाला में मूल्य बढ़ने पर दूसरी समकमाला में भी मूल्य बढ़े अथवा घटने पर घंटे तो ऐसे सम्बन्ध को धनात्मक सह-सम्बन्ध कहते हैं। इसके विपरीत, जब एक समंकमाला के मूल्य में वृद्धि पर दूसरी समंकमाला के मूल्य में कमी हो अथवा पहली समंकमाला के मूल्य में कमी होने पर दूसरी समंकमाला के मूल्य में वृद्धि हो, तो उसे ऋणात्मक correlation कहा जाता है।

(2) रेखीय तथा वक्रीय सह-सम्बन्ध – जब दो समंकमालाओं में परिवर्तनों का अनुपात स्थिर रहता है तो इसे रेखीय सह-सम्बन्ध कहते हैं; जैसे-यदि यह निश्चित है कि मूल्यों में प्रत्येक 1% की वृद्धि से माँग में 2% कमी आयेगी तो इसे रेखीय सह-सम्बन्ध कहा जायेगा। यदि परिवर्तन का अनुपात स्थायी न हो, तो वक्ररेखीय correlation कहेंगे।

Degrees of Correlation / सह-सम्बन्ध का परिमाण


दो घर मूल्यों के मध्य के सम्बन्ध का परिमाण या मात्रा ज्ञात करने के लिये सह-सम्बन्ध के गुणांक की गणना की जाती है। इस आधार पर सह-सम्बन्ध के अग्र परिमाण हो सकते हैं-

1. पूर्ण सह-सम्बन्ध (Perfect Correlation)-जब दो घरों में परिवर्तन एक ही दिशा तथा एक ही अनुपात में हो तो ऐसा सह-सम्बन्ध पूर्ण तथा धनात्मक कहलाता है। ऐसी स्थिति में correlation गुर्णाक +1 होगा। इसके विपरीत जब एक घर के परिवर्तन के परिणामस्वरूप दूसरे पर में परिवर्तन विपरीत दिशा में हो, परन्तु समान अनुपात में हो तो उन घरों में पाये जाने वाले सह-सम्बन्ध पूर्ण ऋणात्मक सह-सम्बन्ध कहलाता है। ऐसी स्थिति में सह-सम्बन्ध गुणांक -1 होगा।

2. सह-सम्बन्ध की अनुपस्थिति (Absence of Correlation) – यदि दो विभिन्न वरों में परस्पर आश्रितता तथा सहानुभूति मूलक कोई अंतर्सम्बन्धन पाया जाता हो तो ऐसी स्थिति में सह-सम्बन्ध का अभाव एवं अनुपस्थिति समझी जाती है। इस स्थिति में सह-सम्बन्ध गुणांक शून्य(O) होगा।

3. सह-सम्बन्ध के सीमित परिमाण (Limited Degrees of Correlation) – जब सह-सम्बय न तो पूर्ण हो और न सह-सम्बन्ध का अभाव हो। ऐसी स्थिति में सह-सम्बन्ध सीमित मात्रा अवदा परिमाण में पाया जाता है। सीमित परिमाण का सह-सम्बन्ध भी धनात्मक एवं ऋणात्मक दोनों प्रकार का हो सकता है। परिमाण की दृष्टि से सीमित सह-सम्बन्ध की निम्न दशायें हो सकती है-

(i) सह-सम्बन्ध का उच्च परिमाण (High Degree of Correlation) – जब दो चरों अवदा समंक श्रेणियों में पूर्ण सह-सम्बन्ध न हो परन्तु पर्याप्त मात्रा में हो तो इसे उच्चस्तरीय सह-सम्बन्ध कहते हैं। उच्च स्तरीय सह-सम्बन्ध गुणांक 0.75 से लेकर 1 के मध्य स्थित होता है। प्रायः इसका मान = 0.9 के लगभग ही रहता है।

(ii) मध्य स्तरीय सह-सम्बन्ध (Moderate Degree of Correlation)- यदि सह-सम्बन्ध उच्च स्तर का न हो परन्तु बहुत अधिक कम भी न हो तो उसे हम मध्य स्तरीय सह-सम्बन्ध कहते हैं। इसका गुणांक 0.25 से लेकर 0.75 के मध्य में स्थित रहता है।

(iii) निम्न स्तरीय सह-सम्बन्ध (Low Degree of Correlation) – निम्न स्तरीय सह-सम्बन् मध्यस्तरीय सह-सम्बन्ध से कम तथा शून्य की स्थिति से ऊपर की मात्रा की ओर संकेत करता है। निम्न स्तरीय सह-सम्बन्ध गुणांक सदैव शून्य (0) से अधिक, परन्तु = 0.25 से कम ही रहता है।

3. सरल, बहुगुणी और आशिक सह सम्बन्ध – दो वरों के मूल्यों के सह-सम्बन्ध को सरल सह-सम्बन्ध कहते हैं। इनमें एक चर मूल्य आश्रित होता है और दूसरा अनाश्रित। इसके अतिरिक्त जब दो से अधिक चर मूल्यों का सम्बन्ध ज्ञात किया जाता है तो वह दो प्रकार का हो सकता है बहुगुणी तथा आंशिक एक आश्रित चर-मूल्य पर दो अथवा अधिक चर मूल्यों के सम्मिलित प्रभाव को बहुगुणी सह-सम्बन्ध कहा जायेगा। आंशिक सह-सम्बन्ध के अन्तर्गत यद्यपि दो से अधिक दर मूल्यों के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है, परन्तु अन्य चर मूल्यों के प्रभाव को स्थिर रखकर केवल दो घरों के मूल्यों का परस्पर सम्बन्ध ज्ञात किया जाता है।

Methods of Determining Correlation /सह-सम्बन्ध ज्ञात करने की रीतियाँ


सह-सम्बन्ध ज्ञात करने की प्रमुख गणितीय रीतियाँ निम्नलिखित है-

Method of determining correlation

(1) कार्ल पियर्सन का सह-सम्बन्ध गुणांक(Karl Pearson’s Co-efficient of Correlation)

प्राणीशास्त्र के सुप्रसिद्ध विद्वान् प्रो. कार्ल पियर्सन ने प्राणीशास्त्र की समस्याओं का अध्ययन करने के लिए सन् 1890 में सह-सम्बन्ध गुणांक का प्रतिपादन किया। यह विधि अत्यन्त श्रेष्ठ मानी जाती है क्योंकि इससे सह-सम्बन्ध की दिशा व मात्रा का ही अनुमान नहीं होता है वरन इसका गुणात्मक माप भी होता है। इसलिए इसे गुण-परिधान सह-सम्बन्ध गुणांक भी कहते हैं। कार्ल पियर्सन से सह-सम्बन्ध गुणांक की निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती है-

(क) यह रीति बीजगणित की दृष्टि से अत्यन्त उत्तम है क्योंकि यह श्रेणी के सभी पदों व मूल्यों पर होने के कारण सह-विचरण का एक आदर्श व उचित माप प्रस्तुत करती है।

(ख) प्रो. कार्ल पियर्सन ने सह-सम्बन्ध गुणांक से सह-सम्बन्ध की दिशा, मात्रा व सीमाओं का ज्ञान होता है। यदि गुणांक धन में आता है तो सह-सम्बन्ध धनात्मक होता है। इसके विपरीत गुणांक के ऋणात्मक होने पर ऋणात्मक सम्बन्ध हो जाता है। यदि गुणांक शून्य होता है तो सह-सम्बन्ध का अभाव पाया जाता है।

(2) स्पियरमैन की कोटि-अन्तर विधि (Spearman’s Rank Difference Method)

प्रो. चार्ल्स एडवर्ड स्पियरमैन ने सह-सम्बन्ध गुणांक ज्ञात करने की एक नवीन रीति का आविष्कार किया जिसे स्पियरमैन की कोटि-अन्तर नाम से जाना जाता है। यह रीति कार्ल पियर्सन की तुलना में अत्यन्त सरल पायी जाती है। यह रीति स्पियरमैन की श्रेणी या अनुपस्थिति रीति के नाम से जानी जाती है। यह रीति श्रेणी के पदों के क्रम पर आधारित है। पद-मूल्यों के आकार आधार पर ही क्रम निश्चित कर लिया जाता है। यह विधि उस समय उपयोग लायी जाती है तब तथ्यों को निश्चित संख्या में व्यक्त करना कठिन होता है किन्तु उन्हें एक निश्चित क्रम में रखना सम्भव होता है। इस विधि द्वारा सह-सम्बन्ध गुणांक ज्ञात करने के लिए निम्नलिखित विधि का उपयोग किया जाता है

(i) प्रत्येक श्रेणी के मूल्यों का पृथक् रूप से क्रम ज्ञात किया जाता है जो सबसे बड़े मूल्य से प्रारम्भ किया जाता है।

(ii) दो श्रेणियों के पदों के क्रमों को क्रमशः घटाकर विचलन प्राप्त होता है।

(iii) इन विचलनों का वर्ग करके उनका योग प्राप्त किया जाता है।

(iv) इस रीति की सहायता से निम्न सूत्र के आधार पर गुणांक निकाले जाते हैं

Correlation determining method

परन्तु जब किसी श्रेणी के एक ही मूल्य के दो यो अधिक पद समान हों तो यह क्रम निश्चित करने में कठिनाई होती है। समान पदों को समान क्रम दे दिया जाता है तथा अगले पदों को आगे का क्रम दिया जाता है। यह सूत्र निम्न प्रकार है

Correlation determining method

कार्ल पियर्सन और स्पियरमैन रीतियों की तुलना की दृष्टि से दोनों का निर्वाचन एक ही प्रकार होता है लेकिन दोनों के गुणांकों में पर्याप्त अन्तर आ सकता है। क्योंकि कार्ल पियर्सन रीति सभी प के वास्तविक मूल्यों पर आधारित है, जबकि स्पियरमैन रीति पदों के क्रमों पर ही आधारित है।

(3) संगामी विचलन गुणांक विधि(Coefficient of Concurrent Deviation Method)

प्रो. कार्ल पियर्सन का सह-सम्बन्ध गुणांक निकालने के लिए गणितीय रीति अपनानी पड़ती है। कभी-कभी दो श्रेणियों के बीच सह-सम्बन्ध की वास्तविक मात्रा जानने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इसमें केवल यह ज्ञात किया जाता है कि सम्बन्ध धनात्मक या ऋणात्मक है। इस प्रकार यह प्रणाली सह-सम्बन्ध की दिशा जानने के लिए उत्तम मानी जाती है। यह पद्धति रेखीय विन्दु प्रणाली पर आधारित है। इसका उपयोग केवल अल्पकालीन परिवर्तनों के लिए किया जाता है। इस रीति में माध्य से विचलन नहीं निकाले जाते बल्कि प्रत्येक पद का विचलन उससे पूर्व वाले पद के मूल्य से निकाला जाता है। विचलन निकालने में भी उसकी मात्रा की उपेक्षा करके केवल विचलन की दिशा (+ अथवा) को ही ध्यान में रखा जाता है। यदि विचलन शून्य हो, अर्थात् पूर्व पद के मूल्य के बराबर ही सम्बन्धित पद का मूल्य हो, वहाँ का निशान लगा दिया जाता है। X तथा Y श्रेणियों के तत्सम्बन्धी विचलन चिन्हों (corresponding deviation signs) को गुणा करके, “संगामी विचलन’ (concurrent deviatior) वाले कॉलम में लिख दिया जाता है। गुणा के नियम के अनुसार दो समान चिन्हों का गुणा + होता है अर्थात् ++ तथा का गुणा होता है। असमान चिन्हों अर्थात् + – अथवा – + का गुणा होता है। संगामी विचलन के कॉलम में लिखे चिन्हों को जोड़ लिया जाता है तथा निम्न सूत्र से सह-सम्बन्ध गुणक ज्ञात किया जाता है –

Correlation determining method

यहाँ rc = संगामी विचलन गुणक (Coefficient of concurrent deviations)

C = संगामी विचलनों की संख्या (Number of concurrent deviations)

N = विचलन युग्मों की संख्या (Number of pairs of deviations)

Correlation गुणक में + अथवा – चिन्ह का [ 2C – N / N ]के चिन्ह के अनुसार लगाया जाता है। यदि इसका परिणाम + होगा तो r भी +, और – होगा तो r भी होता है।

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