Data समंक का आशय एवं परिभाषा और इसके प्रकार

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Saurabh Guptahttp://karekaise.in
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Meaning and Definition of Data  / समकों  का आशय एवं परिभाषा


Data सांख्यिकीय अनुसन्धान की आधारशिला और मुख्य कच्ची सामग्री है। इनका आशय किसी घटना या समस्या के उन पहलुओं से होता है, जिसकी गणना की जा सकती है या जिसे मापा जा सकता है या जिसे संख्यात्मक रूप में व्यक्त किया जा सकता है। इस प्रकार समंक से आशय ऐसे संख्यात्मक तथ्यों से है, जो किसी पटना की माप, गणना या अनुमान प्रस्तुत करते हैं। साथ ही समंक किसी पूर्व निश्चित उद्देश्य या अनुसन्धान की पूर्ति के लिए संकलित किये जाते हैं।

Data

यूल एवं केण्डाल (Yule and Kendall) के अनुसार, “समंक से आशय ऐसे संख्यात्मक तथ्यों से है, जो एक बड़ी सीमा तक अनेक कारणों से प्रभावित होते हैं।”

होरेस सेक्राइस्ट (Horace Secrist) के शब्दों में, “समंक से आशय तथ्यों के ऐसे समूह से है, जो अनेक कारणों से पर्याप्त सीमा तक प्रभावित होते हैं, जो संख्याओं में व्यक्त किए जाते हैं, जो यथोचित शुद्धता के अनुसार जिने या अनुमानित किये जाते हैं, जो किसी पूर्व निर्धारित उद्देश्य के लिए संगृहीत किये जाते हैं तथा जिन्हें एक-दूसरे से सम्बन्धित रूप में प्रस्तुत किया जाता है।”

Types of data /  समकों के प्रकार


समकों के विभिन्न प्रकारों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

Types of Data

(I) तथ्यों की विशेषताओं के आधार पर (On the basis of characteristics of facts ) – तथ्यों की विशेषताओं के आधार पर समंक निम्न दो प्रकार के होते हैं-

(1) संख्यात्मक समक (Quntitative Data or Numerical Data)- संख्यात्मक समंक वे समंक हैं जो चरों के प्रत्यक्ष माप पर आधारित होते हैं; जैसे आयु, आय, उत्पादन, मूल्य,प्राप्तांक आदि। ऐसे तथ्यों को घर मूल्य (Variables) कहा जाता है। घर मूल्य दो प्रकार के हो सकते हैं—(अ) खण्डित घर (Discrete Variables)-खण्डिज चर वे होते हैं, जिनके मूल्य निश्चित (Individually distinct) तथा खण्डित (discontinuous) होते हैं या इनमें विस्तार नहीं होता और एक मूल्य से दूसरे मूल्य के मध्य सुनिश्चित अन्तर होता है; जैसे—परिवार में बच्चों की संख्या पूर्णांक के रूप में होती है या बच्चों की संख्या 4 या 5 हो सकती है, लेकिन 0-5 नहीं हो सकती। जूतों के नम्बर 5 या 6 हो सकते हैं, लेकिन 5-4 नहीं होता (ब) सतत घर (Continuous Variables)-सतत चर वे हैं, जिनकी बारम्बारता नहीं टूटती और निश्चित सीमाओं के अन्तर्गत उनका कोई भी मूल्य हो सकता है; जैसे-व्यक्ति की आयु, लम्बाई, वजन इत्यादि।

(2) गुणात्मक समक (Qualitative Data) गुणात्मक समंकों में ऐसे तथ्यों को शामिल किया जाता है, जिन्हें प्रत्यक्ष रूप से मापा नहीं जा सकता और जिनकी किसी गुण की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर गणना की जाती है। उदाहरण के लिए साक्षर, निरक्षर, रोजगार, बेरोजगार, ईमानदार इत्यादि। ऐसे तथ्य को गुण कहा जाता है। ऐसे समंकों को गुणों अथवा विशेषताओं के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

(II) व्यवस्था के आधार पर (On the basis of arrangement) व्यवस्था के आधार पर समंक निम्न प्रकार के होते हैं

(1) अव्यवस्थित समक (Unarranged Data)-समकों के संकलन के पश्चात् लेकिन उनका वर्गीकरण और सारणीयन से पहले जो स्वरूप होता है, उन्हें अव्यवस्थित समंक कहते हैं। अव्यवस्थित समंकों से सांख्यिकीय विश्लेषण एवं निर्वाचन करना कठिन होता है। इस प्रकार अव्यवस्थित समंकों को समझना, उनकी विशेषताओं को ज्ञात करना एवं उनसे कोई उचित निष्कर्ष निकालना असम्भव होता है।

(2) व्यवस्थित समक (Arranged Data)-जब एकत्रित समंकों को क्रमबद्ध करके वर्गीकरण कर लिया जाता है तथा सारणी के रूप में उनकी प्रस्तुति की जाती है, तो उन्हें व्यवस्थित समंक कहते हैं। वर्गीकरण संकलित समकों को उनकी विशेषताओं तथा समानताओं के आधार पर विभिन्न वर्गों में बाँटने की क्रिया है। सारणीयन वर्गीकृत समंकों को व्यवस्थित रूप से खानों एवं पंक्तियों में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया है।

(III) चरों की संख्या के आधार पर (On the basis of number of variables) चरों की संख्या के आधार पर समंक निम्न प्रकार के होते हैं

(1) एक चरीय समक (Univariate Data)- जब एक चर मूल्य के आधार पर आवृत्तियों निर्धारित की जाती हैं तो उसे एक-चरीय समंक कहते हैं, जैसे-मजदूरी के आधार पर मजदूरों की संख्या, आय के आधार पर व्यक्तियों की संख्या इत्यादि।

(2) द्वि-चरीय समक (Bivariate Data)-जब दो चरों या मूल्यों को एक साथ ध्यान में रखकर समंकों का प्रस्तुतीकरण किया जाता है, तो उन्हें द्वि-चरीय समंक कहा जाता है। जैसे दो विषयों में प्राप्त अंकों को एक ही आवृत्ति सारणी में प्रस्तुत करना या लम्बाई और भार दोनों चरों के आधार पर व्यक्तियों की संख्या को एक सारणी में रखना इत्यादि द्वि-चरीय समकों के लिए द्वि-मार्गीय आवृत्ति तालिका (Two-way Frequency Table) का निर्माण किया जाता है।

(IV) संकलन के आधार पर (On the basis of collection) – संकलन की दृष्टि से समंक निम्न दो प्रकार के होते हैं-

(1) प्राथमिक समंक (Primary Data)- प्राथमिक समंकों से आशय उन समंकों से है जो किसी अनुसन्धानकर्ता द्वारा पहली बार आरम्भ से लेकर अन्त तक नये सिरे से एकत्रित किये जाते हैं। इस प्रकार के समंकों का संकलन अनुसन्धानकर्ता अपने प्रयोग के हितार्थ करता है। प्राथमिक समंक मौलिक होते हैं और वे अनुसन्धान के लिए कच्ची सामग्री की भाँति होते हैं। प्राथमिक समंकों के संकलन में अधिक समय, श्रम एवं धन की आवश्यकता होती है; जैसे-ग्रामीण विकास हेतु दिये गये ऋण एवं उनसे प्राप्त लाभ के सम्बन्ध में अध्ययन करने हेतु यदि अनुसन्धानकर्ता प्रत्येक लाभार्थी के यहाँ जाकर समंक एकत्रित करे तो ऐसे एकत्रित सर्मकों को प्राथमिक समंक कहा जायेगा।

(2) द्वितीयक समंक (Secondary Data)-द्वितीयक समंक से आशय ऐसे समंकों से है जिनका पहले से ही अन्य व्यक्तियों एवं संस्थाओं द्वारा संकलन एवं प्रकाशन हो चुका है और वर्तमान अनुसन्धानकर्ता केवल इनका उपयोग करता है। द्वितीयक समंक निर्मित माल की भाँति होते हैं, जिन्हें मौलिक नहीं कहा जा सकता है। द्वितीयक समंक एकत्र करने में समय, श्रम, बुद्धि एवं धन कम लगता है; जैसे-चीनी उद्योग की प्रगति का अध्ययन करने के लिए यदि अनुसन्धानकर्ता सरकार द्वारा प्रकाशित चीनी उद्योग के समंकों का प्रयोग करता है तो वे समंक उसके लिए द्वितीयक समंक होते हैं।

Characteristics of Data / समंकों की विशेषताएँ


बहुवचन या समकों के रूप में सांख्यिकी की निम्न विशेषताएँ पायी जाती है

Characteristic of Data

1. तथ्यों का समूह- समंक तथ्यों के समूह के रूप में पाये जाते हैं। एक संख्या या घटना को समंक नहीं कहा जा सकता है। प्रो. चार्ल्स पी. वोमिनी का कथन है कि “सभी संख्यायें समंक नहीं होती हैं।”

2. संख्या में व्यक्त- समंकों में केवल वही तथ्य सम्मिलित किये जाते हैं जिन्हें संख्याओं में व्यक्त किया जा सकता है। अन्य शब्दों में, जब तक इन्हें परिमाणात्मक रूप में नहीं व्यक्त किया जाता है, यह समंक नहीं कहे जाते हैं।

3. अनेक कारणों से प्रभावित – सांख्यिकी तथ्य किसी एक कारण से न होकर अनेककारणों से प्रभावित होते हैं। इसीलिये कहा जाता है कि समंक एक जटिल तथ्यों की माप से सम्बन्धित है जिनका विकास बदलती परिस्थितियों में होता है।

4. उचित मात्रा में शुद्धता- समंकों का संकलन करते समय पर्याप्त मात्रा में शुद्धतां होनी चाहिये। शुद्धता का स्तर इस बात पर निर्भर करता है कि समंकों के संकलन का क्षेत्र, उद्देश्य तथा साधन क्या पाये जाते हैं। यही इसकी विशेषता है।

5. पूर्व निश्चित उद्देश्य – उद्देश्यहीन संकलित आंकड़े समंक नहीं कहलाते हैं। केवल ऐसे तथ्यों का संकलन समंक कहलाता है जो किसी कार्य के पूर्व निश्चित उद्देश्य के लिये किया गया हो। बिना उद्देश्य के संकलन संख्याओं का ढेर होता है।

6. व्यवस्थित होना- आंकड़ों में उचित स्तर की शुद्धता के लिये यह भी आवश्यक उनका संचालन व्यवस्थित रूप से किया जाना चाहिये। आंकड़ों के संकलन के पूर्व उद्देश्य, है कि क्षेत्र तथा रीति का निर्धारण कर लिया जाना चाहिये।

7. परस्पर सम्बन्ध- आंकड़ों के एकत्रित करने का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य तुलना भी होता है। अतएव आंकड़े ऐसे होने चाहिये जिसे परस्पर तुलनात्मक रूप में रखा जा सके। अतएव आंकड़ों में सजातीयता का पाया जाना भी अनिवार्य है।

उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि समकों का सम्बन्ध किसी व्यक्ति विशेष से व होकर समूह से होता है। इसी प्रकार किसी एक तथ्य की संख्या में व्यक्त करना समंक नहीं कहलाता है वरन तथ्यों के समूह या विशेषताओं वाली संख्याओं को ही समंक कहते हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि “एक तथ्य नहीं बल्कि तथ्यों के समूह सांख्यिकी की विषय सामग्री होती है।”

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