Index Number का अर्थ एवं परिभाषा और इसकी विशेषताएं एवं उद्देश्य

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Saurabh Guptahttp://karekaise.in
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Meaning and Definition of Index Number / निर्देशांक का अर्थ एवं परिभाषा


परिवर्तन प्रकृति का नियम है। जिस प्रकार जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परिवर्तन होता रहता है। टीक उसी प्रकार आर्थिक जगत् में भी परिवर्तन होता रहता है। कभी आर्थिक जगत में होने वाले परिवर्तनों की प्रकृति इतनी प्रभावशाली होती है कि इनका समय-समय पर माप करना आवश्यक हो जाता है। यद्यपि इन उच्चावचों को प्रत्यक्ष रूप से मापना कठिन होता है फिर भी सापेक्ष रूप से इनका माप सम्भव होता है। इसीलिए कहा जाता है कि सूचकांक वास्तव में विभिन्न आर्थिक पहलुओं में होने वाले उच्चावचों को मापने की एक सापेक्ष विधि है। प्रो. सिम्पसन ने कहा है कि,”सूचकांक एक प्रकार से आर्थिक वायुमापक यन्त्र के समान है। इसका प्रयोग अर्थव्यवस्था नब्ज देखने के लिए किया जाता है…….”

Index number

प्रो. होरेस सेक्राइस्ट के अनुसार, ” Index number एक ऐसा संख्यात्मक माप है जिसके द्वारा समय, स्थान या अन्य विशेषता के आधार पर किसी चर मूल्य का वा सम्बन्धित घर-मूल्यों के समूह के होने वाले परिवर्तनों को मापा जाता है।

प्रो. बाउले के अनुसार, ” index number एक ऐसी श्रेणी है जो अपने झुकाव तथा उच्चायचों के द्वारा उस परिमाण के परिवर्तनों को प्रदर्शित करती है जिससे यह सम्बन्धित है।”

Characteristics of Index Number / निर्देशांक की विशेषताएँ या लक्षण


इसकी विशेषताएँ इस प्रकार पायी जाती है-

(1) Index number किसी समय अथवा स्थान के आधार पर आर्थिक पहलुओं में होने वाले परिवर्तनों का निरपेक्ष माप न होकर सापेक्ष परिवर्तनों का माप है।

(2) Index number के किसी तव्य में होने वाले परिवर्तनों का माप सदैव माध्य के रूप में व्यक्त किया जाता है। संक्षेप में, सूचकांक प्रतिशतों का माध्य होता है।

(3) निर्देशांक का उपयोग व्यापक क्षेत्र में किया जाता है। किसी भी घटना के सापेक्ष मापन के लिए सूचकांकों का प्रयोग किया जा सकता है।

(4) निर्देशांक सदैव आर्थिक परिवर्तनों के माप को संख्या में व्यक्त करता है।

(6) index number कीमत स्तर, उत्पादन स्तर आदि में होने वाले परिवर्तन की दिशा को औसत के रूप में प्रकट करते हैं।

Objectives of Index Numbers / निर्देशांक के उद्देश्य


निर्देशांक या सूचकांक के प्रमुख उद्देश्यों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जाता है-

(1) निर्देशांक का उद्देश्य जटिल तथ्यों को सरल बनाकर जनसाधारण को लाभ पहुँचाना है।

(2) देश की आर्थिक गतिविधियों का मापन करना।

(3) मुद्रा की क्रय शक्ति का अनुमान लगाना।

(4) भावी प्रवृत्तियों का अनुमान प्रस्तुत करना।

(5) मौद्रिक नीति के निर्माण हेतु आधार प्रस्तुत करना।

(6) दो समयावधि में होने वाले परिवर्तनों की तुलनात्मक जानकारी कराना।

(7) वास्तविक आय की जानकारी प्रदान करना।

(8) रहन-सहन के स्तर में होने वाले परिवर्तनों का ज्ञान कराना।

Importance or Utilities of Index Numbers /निर्देशांक की उपयोगिता या महत्व


आज के प्रगतिशीलत एवं व्यावसायिक युग में Index number को एक अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। यह केवल वर्तमान की ही व्याख्या नहीं करता है वरन भविष्य के लिए पूर्वानुमान करने की क्षमता भी रखता है। वास्तव में सूचकांक आर्थिक वायु मापक यन्त्र के समान है। जिस प्रकार ऋतु विज्ञान में वायु मापक यन्त्र ऋतु परिवर्तनों तथा हवा के दबाव को मापता है, ठीक उसी प्रकार आर्थिक जगत् में होने वाले आर्थिक परिवर्तनों का कार्य सूचकांक करते हैं। इस सम्बन्ध में प्रो. ब्लेयर का कथन है कि, “ Index number व्यावसायिक पथ-प्रदर्शक तथा निवेश स्तम्भ है जो व्यापारी को अपने कार्यों का संचालन व प्रबन्ध करने की रीति का ज्ञान कराते हैं। संक्षेप में, निर्देशांक के आर्थिक महत्व इस प्रकार पाये जाते हैं

(1)जटिल तथ्यों को सरल बनाना – सूचकांक जटिल तथ्यों को जिनका प्रत्यक्ष व परोक्ष या निरपेक्ष माप सम्भव नहीं होता है, मापने की सुविधा प्रदान करता है। यही नहीं बहुत से ठोस रूप प्रदान करने हेतु भावनात्मक तथ्यों का भी अध्ययन इसकी सहायता से किया जाने लगा है। इसीलिए कहा जाता है कि निर्देशांक जटिल तथ्यों को जन-सामान्य को समझने योग्य व सर बनाने का कार्य करता है।

(2) तुलनात्मक अध्ययन को सम्भव बनाना-निर्देशांक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह तुलनात्मक अध्ययन की सुविधा प्रदान करता है। इसके फलस्वरूप किसी समय या स्थान के आधार पर घटनाओं की तुलना आसानी से की जा सकती है।

(3) सामान्य मूल्यों में परिवर्तन का अध्ययन करना – मूल्य सूचकांकों की सहायता से सामान्य मूल्यों के परिवर्तन का अध्ययन किया जाता है। इसके आधार पर ही एक व्यवसायी एवं उपभोक्ताओं को अपनी-अपनी क्रियाओं को संचालित करने में सहायता मिलती है। इसके अध्ययन से मूल्यों में स्थिरता आती है। इस प्रकार निर्देशांक सामान्य मूल्य के अध्ययन करने में अत्यन्त उपयोगी होता है।

(4) भावी आर्थिक प्रकृति की ओर संकेत करना – निर्देशांक भूत के सन्दर्भ में केवल वर्तमान की व्याख्या नहीं करता है वरन् इसके आधार पर भविष्य के बारे में महत्वपूर्ण निष्कर्ष तथा निर्णय निकाले जा सकते हैं। महँगाई भत्ता, वेतन आदि निश्चित करने में इससे सहायता मिलती है। इस प्रकार इसके द्वारा परिणाम पर पहुँचने के लिए वर्तमान क्रियाओं पर नियन्त्रण लगाया जा सकता है।

(5) आर्थिक नीतियों के निर्माण में सहायता करना-निर्देशांक का एक अन्य महत्वपूर्ण उपयोग आर्थिक नीतियों के निर्माण में सहायता प्रदान करना पाया जाता है। थोक मूल्य सूचकांकों की सहायता से सामान्य मूल्य में स्थिरता लाने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं। इसी प्रकार उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों के अध्ययन से जीवन निर्वाह व्यय का भी आसानी से पता लगाया जा सकता है।

(6) आर्थिक विकास का मापक यन्त्र – आर्थिक विकास के मापक यन्त्र के कारण यह सरकार के लिए अत्यन्त उपयोगी है। इसके अध्ययन के द्वारा सरकार को उत्पादन क्षेत्रों की सही दिशा व प्रगति का अनुमान हो जाता है। यही कारण है कि निजी क्षेत्र, सार्वजनिक क्षेत्र तथा आर्थिक नियोजन सम्बन्धी रूपरेखा नियोजित करने में सूचकांकों का अत्यधिक मात्रा में उपयोग किया जाता है। उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि आर्थिक व व्यावसायिक जगत में होने वाले परिवर्तनों का विश्लेषणात्मक अध्ययन करने के लिए निर्देशांक अत्यन्त उपयोगी माने जाते हैं।

यह कहना गलत न होगा कि निर्देशांक आर्थिक जगत का प्राण है क्योंकि उत्पादन, उपभोग, मुद्रा का मूल्य, माँग-पूर्ति तथा मूल्य-स्तर जैसी समस्याओं का समाधान निर्देशांक द्वारा ही किया जाता है।

Points to be Considered in the Construction of Index Numbers / निर्देशांक की रचना में ध्यान रखने योग्य बातें


निर्देशांक की रचना में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिनके सम्बन्ध में उचित सावधानी रखने पर ही निर्देशांक सही स्थिति प्रकट कर सकता है। अतः निर्देशांक की रचना करते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए –

(1) निर्देशांक का उद्देश्य (Purpose of Index Numbers) सर्वप्रथम यह स्पष्ट और निश्चय करना होता है कि निर्देशांक तैयार करने का उद्देश्य क्या है ? वास्तव में उद्देश्यों के आध र पर ही निर्देशांक के निर्माण की पूरी प्रक्रिया आधारित रहती है क्योंकि विभिन्न उद्देश्यों के लिए अलग-अलग प्रकार के निर्देशांक उपयुक्त होते हैं, जैसे-मजदूरी और वेतन सम्बन्धी समस्याओं के अध्ययन के लिए ‘फुटकर मूल्य निर्देशांक मुद्रा के मूल्य में हुए परिवर्तनों की जानकारी के लिए ‘थोक मूल्य निर्देशांक’ एवं सम्पूर्ण समाज की दृष्टि से कोई निर्णय लेने के लिए सामान्य मूल्य निर्देशांक तैयार करना होगा।

(2) आधार वर्ष का चुनाव (Selection of Base Year) निर्देशांक सामान्यतः वार्षिक आधार पर बनाये जाते हैं और किसी एक वर्ष के मूल्यों के आधार पर विभिन्न वर्षों के निर्देशांकों की रचना की जाती है। जिस वर्ष को आधार माना जाता है, उसी वर्ष को ‘आधार वर्ष’ कहा जाता है। निर्देशांक की रचना करने से पूर्व आधार वर्ष का चुनाव सावधानी से करना चाहिए। इसके चुनाव में दो बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए-(अ) आधार वर्ष बहुत पुराना न हो तथा (व) यह वर्ष लगभग सभी दृष्टियों से एक साधारण अथवा औसत वर्ष हो अर्थात् आधार वर्ष एक ऐसा वर्ष हो, जिसमें युद्ध, अकाल, बाद या असाधारण प्राकृतिक, राजनैतिक या आर्थिक परिस्थिति न रही हो। आधार निश्चित करने की भी दो रीतियाँ हो सकती है-(अ) स्थिर आधार रीति (Fixed Base Method) तथा (ब) शृंखला आधार रीति (Chain Base Method)।

(3) प्रतिनिधि वस्तुओं या मदों का चुनाव (Selection of Representative Items or Commodities)- व्यवहार में अनेक प्रकार की वस्तुओं और सेवाओं का क्रय-विक्रय किया जाता है, लेकिन इन सभी को निर्देशांकों के निर्माण में शामिल करना सम्भव नहीं होता। अतः कुछ प्रतिनिधि वस्तुओं या मदों का चुनाव किया जाता है। इस सम्बन्ध में निम्न दो बातों को ध्यान -रखना चाहिए-(अ) चुनी गयी वस्तुएँ उन व्यक्तियों की रुचि, आदत, व्यवहार और आवश्यकताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली हों, जिनके लिए निर्देशांक बनाया जा रहा है। (ब) चुनी गयी वस्तुएँ किस्म की दृष्टि से स्थिर प्रकृति की हो और यथा-सम्भव प्रमापीकृत हो। वस्तुओं के चुनाव में एक समस्या यह भी आती है कि कितनी वस्तुओं का चुनाव किया जाये। सैद्धान्तिक रूप से वस्तुएँ जितनी अधिक होंगी, निर्देशांक वास्तविकता के उतना ही अधिक निकट होगा।

(4) प्रतिनिधि मूल्यों का चुनाव (Selection of Representative Prices) – प्रतिनिधि वस्तुओं का चुनाव करने के पश्चात् निर्देशांक की रचना के लिए प्रतिनिधि मूल्यों का चुनाव किया जाये। बाजार में मूल्यों को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जा सकता है फुटकर और थोक मूल्य यदि मुद्रा के मूल्यों में परिवर्तनों को मापना है तो थोक मूल्य उपयुक्त रहेंगे, लेकिन यदि जीवन निर्वाह व्यय निर्देशांक की रचना करनी हो तो फुटकर मूल्यों को ही लेना उपयुक्त होगा। एक ही वस्तु के विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग मूल्य हो सकते हैं। अतः प्रश्न यह उठता है कि मूल्य कहीं से एकत्रित किये जायें। यदि किसी स्थान विशेष के व्यक्तियों के लिए उपभोक्ता मूल्य निर्देशांक बनाया। जा रहा है तो उसी स्थान विशेष से मूल्य एकत्रित करने चाहिए लेकिन सामान्य मूल्य निर्देशांक के लिए विभिन्न केन्द्रों से मूल्य एकत्र कर उनका औसत मूल्य लिया जाना चाहिए। मूल्य प्राप्त करने के विभिन्न स्रोत हो सकते हैं। इनमें अपना प्रतिनिधि, स्थानीय व्यापारी, समाचार पत्र, सरकारी या अर्द्ध-सरकारी माध्यम आदि शामिल हैं। इनका चयन निर्देशांक तैयार करने वाले की सुविधा को ध्यान में रखकर करना होता है।

(5) भार देने की समस्या (Problem of Weighting)-निर्देशांकों में शामिल सभी वस्तुओं का समान महत्व नहीं होता। अतः यह आवश्यक होता है कि विभिन्न मदों वस्तुओं को उचित भार दिया जाये। भार देने की दो रीतियों है प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रत्यक्ष भार वस्तुओं की मात्रा अथवा कुल मूल्य के आधार पर दिये जाते हैं जबकि अप्रत्यक्ष भार वस्तुओं के तुलनात्मक महत्व को ध्यान में रखते हुए प्रदान किये जाते हैं।

(6) उपयुक्त माध्य का चुनाव (Choice of Suitable Average)- निर्देशांक एक माध्य अंक है। माध्य का रूप समान्तर माध्य, मध्यका, बहुलक, गुणोत्तर माध्य अथवा हरात्मक माध्य किसी का भी प्रयोग कर सकता है। लेकिन व्यवहार में हरात्मक माध्य और बहुलक को निर्देशांक की रचना के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता। मध्यका का प्रयोग भी कम किया जाता है। गुणोत्तर माध्य को निर्देशांक की रचना के लिए श्रेष्ठ माना जाता है, लेकिन इसकी गणन क्रिया जटिल होने के कारण समान्तर माध्य का प्रयोग भी पर्याप्त मात्रा में किया जाता है।

(7) उपयुक्त सूत्र का चुनाव (Selection of Appropriate Formula) –निर्देशांकों की रचना के अनेक सूत्र है और विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न सूत्रों का प्रयोग करना उपयुक्त रहता है। अतः यह भी निर्णय लेना होता है कि किस सूत्र का प्रयोग किया जाये। सामान्यतः सामान्य निर्देशांक की तुलना में भारित निर्देशांक श्रेष्ठ माना जाता है और भारित निर्देशांक के विभिन्न सूत्रों में फिशर का सूत्र आदर्श माना जाता है।

Limitations of Index Numbers / निर्देशांक की सीमाएँ


निर्देशांक की सीमाएँ इस प्रकार पायी जाती है-

(1) निर्देशांक केवल सापेक्ष अध्ययन को ही सरल बनाता है।

(2) यह औसत के रूप में ही केवल सत्य पाया जाता है।

(3) एक ही प्रकार के निर्देशांक सभी उद्देश्यों के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं।

(4) इसकी रचना में गुणात्मक पहलू पर ध्यान नहीं दिया गया है।

(5) यह केवल दिशा की सूचना देता है। इससे वास्तविक ज्ञान नहीं होता है।

(6) निर्देशांक पूर्णतया शुद्ध नहीं होते हैं।

(7) विभिन्न रीतियों के कारण इसके निष्कर्षों में भिन्नता पायी जाती है।

इस आर्टिकल को पढ़ने के लिए धन्यवाद! अगर आपको ये आर्टिकल अच्छा लगा तो इसे अपने दोस्तों के साथ share करें और नीचे comment करें!जाने क्या है correlation और questionnaire।

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