Primary and secondary Data methods of collection

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Saurabh Guptahttp://karekaise.in
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अगर आप business Statistics के फील्ड से है तो आपको ये जानना बहुत जरूरी है कि primary and secondary Data क्या है। तो चलिए मैं विस्तार से आपको इसकी information देता हूं।

 Meaning of Primary Data / प्राथमिक समंक का अर्थ


Primary Data से आशय उन Data से है। जो किसी अनुसन्धानकर्ता द्वारा पहली बार आरम्भ से लेकर अन्त तक नये सिरे से एकत्रित किये जाते हैं। इस प्रकार के समंकों का संकलन अनुसन्धानकर्ता अपने प्रयोग के हितार्थ करता है। प्राथमिक समंक मौलिक होते हैं और वे अनुसन्धान के लिए कच्ची सामग्री की भाँति होते हैं। Primary Data के संकलन में अधिक समय, श्रम एवं धन की आवश्यकता होती है; जैसे-ग्रामीण विकास हेतु दिये गये ऋण एवं उनसे प्राप्त लाभ के सम्बन्ध में अध्ययन करने हेतु यदि अनुसन्धानकर्ता प्रत्येक लाभार्थी के यहाँ जाकर समंक एकत्रित करे तो ऐसे एकत्रित समंकों को primary Data कहा जायेगा।

Primary and secondary data

Methods of Collecting Primary Data / प्राथमिक समंकों के संकलन की रीतियाँ


प्राथमिक समंकों के संकलन की प्रमुख रीतियाँ निम्नलिखित हैं-

(1) प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसन्धान – इस विधि में अनुसन्धानकर्ता स्वयं अनुसन्धान क्षेत्र में जाता है तथा सूचनाएँ एकत्रित करने हेतु उससे सम्बन्धित व्यक्तियों से सम्पर्क करता है।इस विधि में समस्त कार्य अनुसन्धानकर्ता स्वयं करता है।

गुण (Merits)-

(i) इस विधि द्वारा एकत्रित समंक शुद्ध होते हैं।

(ii) एकत्रित समंक अधिक विश्वसनीय होते हैं।

(iii) समकों में मौलिकता रहती है।

(iv) संकलित समंकों में एकरूपता व सजातीयता पाई जाती है।

(v) अन्य सहायक सूचनाएँ भी प्राप्त होती हैं।

दोष (Demerits)-

(i) इसका प्रयोग क्षेत्र सीमित होता है। विस्तृत क्षेत्र के लिए यह रीति अनुपयुक्त है।

(ii) इसमें पक्षपात (bias) की सम्भावना अधिक होती है।

(iii) यह रीति अपव्ययी है। इसमें धन, समय तथा श्रम का अधिक व्यय होता है।

(2) अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसन्धान – इस विधि के अन्तर्गत अनुसन्धानकर्ता विषय से सम्बन्धित सूचनाएँ प्राप्त करने के लिए व्यक्तियों से प्रत्यक्ष सम्पर्क नहीं करता है। वह विषय से सम्बन्धित जानकारी रखने वाले व्यक्तियों से मौखिक पूछताछ कर जानकारी प्राप्त करता है।

गुण (Merits) –

(i) यह रीति मितव्ययी है। इसमें धन, समय व श्रम कम खर्च होता है।

(ii) विस्तृत क्षेत्र में यह रीति उपयोगी होती है।

(iii) इसमें विशेषज्ञों को सहमति व सुझाव मिल जाते हैं।

((iv) इसमें व्यक्तिगत पक्षपात की सम्भावना नहीं रहती।

(v) इस रीति के द्वारा अपेक्षाकृत अधिक जल्दी निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

दोष (Demerits)–

(i) इस रीति में सूचनाएँ दूसरे पक्षकारों से अप्रत्यक्ष रूप से प्राप्त होती है, अतः कभी-कभी गलत सूचनाएँ प्राप्त होने की सम्भावना रहती है।

(ii) इस रीति में जिन व्यक्तियों से सूचनाएँ प्राप्त की जाती है उनकी लापरवाही, अज्ञानता एवं पक्षपात के कारण समंक दूषित हो जाते हैं।

(iii) इस रीति में अनुसंधानकर्ता सूचना देने वालों के चुनाव में पक्षपात कर अनुसंधान कार्य को पक्षपातपूर्ण बना सकते हैं।

(3) स्थानीय स्रोतों या संवाददाताओं से सूचना प्राप्त करना – इसमें अनुसन्धानकर्ता न ही प्रत्यक्ष और न ही अप्रत्यक्ष सम्पर्क करता है बल्कि सूचनाएँ नियमित रूप से समय-समय पर प्राप्त करने के लिए विभिन्न स्थानों पर संवाददाताओं की नियुक्ति कर देता है। संवाददाता समय-समय पर आवश्यक सूचनाएँ अनुसन्धानकर्ता को भेजते रहते हैं। जिन क्षेत्रों में शीघ्र एवं नियमित रूप से समंकों का संकलन करना होता है, वहाँ पर यह रीति बहुत ही उपयोगी सिद्ध होती है।

गुण (Merits)-

(i) अधिक विस्तृत क्षेत्र के लिए यह प्रणाली अधिक उपयोगी है।

(ii) अधिक फैले हुए (विकेन्द्रित) क्षेत्र के लिए यह प्रणाली अत्यधिक उपयोगी है।

(iii) यह प्रणाली मितव्ययी है क्योंकि इसमें धन, समय व श्रम की बचत होती है।

(iv) यह विधि सरल एवं सस्ती है।

दोष (Demerits)-

(i) इस रीति के द्वारा निष्कर्ष संवाददाताओं के पक्षपात से प्रभावित हो सकते हैं।

(ii) अनुमान पर आधारित होने के कारण निष्कर्ष शुद्धता से दूर होते हैं।

(iii) एकत्रित समंकों में एकरूपता व सजातीयता का अभाव बना रहता है।

(4) सूचकों द्वारा प्रश्नावली भरना – इस प्रणाली को डाक प्रश्नावली प्रणाली भी कहते हैं। इसमें अनुसन्धानकर्ता एक प्रश्नावली तैयार करता है जिसमें अनुसंधान किये जाने वाले विषय से सम्बन्धित आवश्यक प्रश्न होते हैं तथा इसे सूचना देने वाले व्यक्तियों के पास डाक के माध्यम से भेज दिया जाता है तथा सूचना देने वाले व्यक्ति इसे निश्चित समय में भरकर भेज देता है। यह प्रणाली वहाँ अधिक उपयुक्त है जहाँ, अनुसंधान का क्षेत्र बहुत अधिक विस्तृत हो, उस क्षेत्र की जनसंख्या शिक्षित हो और वे प्रश्नावलियों को भरना जानते हों।

यह प्रणाली वहाँ अधिक उपयुक्त है जहाँ, अनुसन्धान का क्षेत्र बहुत अधिक विस्तृत हो, उस क्षेत्र की जनसंख्या शिक्षित हो और वे प्रश्नावलियों को भरना जानते हों।

गुण (Merits) –

(i) यह प्रणाली विस्तृत क्षेत्र के लिए अधिक उपयुक्त है।

(ii) यह रीति मितव्ययी है और इसमें धन, समय व परिश्रम कम लगता है।

(iii) इसमें अशुद्धि की कम सम्भावना रहती है।

(iv) सूचनाएँ मौलिक व निष्पक्ष होती हैं।

दोष (Demerits)-

(i) सूचना देने वालों की इसमें प्रायः रुचि नहीं होती, अतः अधिकतर सूचनाएँ नहीं मिलतीं या मिलती हैं तो अपूर्ण होती हैं।

(ii) यदि प्रश्नावली जटिल है, तो उत्तर अशुद्ध होंगे और परिणाम भी अशुद्ध होंगे।

(iii) यदि सूचक पक्षपातपूर्ण व्यवहार करते हैं, तो परिणाम अशुद्ध होंगे।

(5) प्रगणको द्वारा अनुसूचियाँ भरना – इस रीति में प्रश्नावलियों तथा अनुसूचियों को भरने का कार्य प्रशिक्षित प्रगणकों को सौंपा जाता है। प्रगणकों को छपी हुई अनुसूचियाँ दे दी जाती हैं और वे सूचकों के पास और पूछताछ करके उन प्रश्नावलियों को स्वयं भरते हैं। इस प्रणाली की सफलता पूर्णतः प्रगणकों की कार्यकुशलता क्षेत्र से परिचित होना चाहिए। यह प्रणाली वहाँ अधिक उपयुक्त है, जहाँ अनुसंधानकर्ता अधिक व्यय वहन कर सके। यह रीति सरकारी कार्यों में ही अधिक प्रयोग में आती है। भारत में जनगणना इसी रीति द्वारा की जाती है।

गुण (Merits) –

(i) इस रीति द्वारा व्यापक क्षेत्र से सूचना प्राप्त की जा सकती है।

(ii) सूचकों से व्यक्तिगत सम्पर्क स्थापित किए जा सकने के कारण जटिल प्रश्नों के भी शुद्ध व विश्वसनीय उत्तर प्राप्त हो जाते हैं।

(iii) संकलित समंकों में पर्याप्त शुद्धता रहती है।

(iv) व्यक्तिगत पक्षपात का विशेष प्रभाव नहीं पड़ता।

दोष (Demerits)—

(i) अनुसंधान कार्य में अधिक समय लगता है।

(ii) प्रगणकों को प्रशिक्षण देना व उनके कार्य का निरीक्षण करना पड़ता है।

(iii) प्रगणकों में पक्षपात की भावना होने पर उसका प्रभाव निष्कर्ष को अविश्वसनीय बना देता है।

Meaning of Secondary Data / द्वितीयक समंक का अर्थ


सांख्यिकीय अनुसन्धानों में समंकों का संकलन अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है। संग्रहित आंकड़े सांख्यिकीय विवेचन की आधारशिला होते हैं। अशुद्ध तथा अविश्वसनीय आंकड़ों से परिणाम भी गलत प्राप्त होते हैं, संग्रहीत समंक मौलिक रूप से सांख्यिकीय विवेचन के लिये कच्ची सामग्री होते हैं। इसीलिये प्रो. बाउले का मत है कि “समंक संकलन में सामान्य विवेक की प्रमुख आवश्यकता है और अनुभव मुख्य शिक्षक है।” प्राथमिक समक संकलन में धन तथा समय अधिक लगते हैं तथा इसमें गलती होने की सम्भावना पायी जाती है। इनसे बचने के लिये द्वितीयक समंक का सहारा लिया जाता है।

Primary and secondary data

द्वितीयक समक वे समंक हैं जिन्हें पूर्व में किन्हीं व्यक्तियों या संस्थाओं द्वारा एकत्रित किया गया है तथा सांख्यिकीय रीतियों का प्रयोग उनके द्वारा किया जा चुका है। जब कोई अनुसन्धानकर्ता इन आंकड़ों का प्रयोग अपने अनुसन्धान में करता है तो ये आंकड़े उसके लिये द्वितीयक समंक हो जाते हैं। उदाहरणार्थ, ग्रामीण ऋणग्रस्तता का अध्ययन करने के लिये इस विषय पर प्रकाशित रिजर्व बैंक के आंकड़ों का प्रयोग किया जाता है तो यह द्वितीयक सामग्री होगी। इसलिये कहा जाता है कि द्वितीयक समंक वे हैं जिनका संग्रह किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा पहले किया गया है तथा प्रयोग अनुसन्धानकर्ता द्वारा अपने शोध में किया जा रहा है।

Methods of Collecting Secondary Data / द्वितीयक समंकों के संकलन की रीतियाँ


द्वितीयक समंक के प्राप्त करने के प्रायः दो स्रोत पाये जाते हैं–(i) प्रकाशित स्रोत तथा अप्रकाशित खोत । अधिकांश अनुसन्धानकर्ता प्रकाशित समंकों का ही उपयोग करते हैं। इसके प्राप्त होने के मुख्य स्रोत निम्न प्रकार पाये जाते हैं-

 

(i) सरकारी प्रकाशन (Government Publication),

(ii) समितियों तथा आयोगों की रिपोर्ट (Report of Committee and Commission),

(iii) अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रकाशन (Publication of International Institutions),

(iv) विश्वविद्यालयों तथा शोध संस्थाओं के प्रकाशन (Publications of Universities and Research Institutions),

(v) व्यापारिक संगठनों के प्रकाशन (Publications of Trade Organizations),

(vi) गैर सरकारी समक प्रकाशन (Non Govt. Data Publications),

(vii) समाचार पत्र एवं पत्रिकायें News Paper and Magazines),

(viii) व्यक्तिगत शोधकर्ता (Individual Researchers)।

Precuations before Using Secondary Data  / द्वितीयक समकों के प्रयोग में सावधानियाँ


यद्यपि द्वितीयक समकों का संकलन सरल तथा कम खर्चीला होता है फिर भी इसके उपयोग में सावधानी की आवश्यकता होती है। प्रो. कार्नर का कथन है कि “समंक विशेष रूप से अन्य व्यक्तियों के द्वारा संकलित समक, यदि सावधानी से प्रयोग में न लाये जायें तो वे प्रयोगकर्ता के लिये अनेक त्रुटियों से पूर्ण होते हैं। अतः द्वितीयक समकों के प्रयोग करने के पूर्व निम्न बातों पर ध्यान देना आवश्यक है

1. पूर्व अनुसन्धान का उद्देश्य (Objective of Previous Investigation),

2. पूर्व अनुसन्धानकर्ता की योग्यता या व्याति (Ability or Goodwill of Previous Investigators),

3. समक संकलन का समय (Time of Data Collection),

4. समंक संकलन की रीति (Method of Data Collection) ,

5. सन्निकटीकरण की सीमा (Limits of Approximation),

6. विभिन्न समंकों की तुलना (Comparison of Different Data),

7. इकाई की परिभाषा (Definition of Units),

8. परीक्षात्मक जाँच (Experimental Test),

9. शुद्धता का स्तर (Level of Accuracy)

अतएव द्वितीयक समंकों के उपयोग करने के पूर्व उनकी अच्छी तरह से जाँच किया जाना आवश्यक होता है। इस सम्बन्ध में प्रो. बाउले में स्पष्ट रूप से कहा है कि “प्रकाशित समंकों को उनका अर्थ एवं उनकी सीमायें ज्ञात किये बिना उनको उसी रूप में मान लेना कभी खतरे से खाली नहीं है।”

Difference between Primary and Secondary Data / प्राथमिक एवं द्वितीयक समंक में अन्तर


प्राथमिक एवं द्वितीयक समंक में अन्तर को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

(1) प्राथमिक समंक वे समंक हैं, जो अनुसन्धानकर्ता द्वारा स्वयं अपने प्रयोग के लिए मौलिक रूप से एकत्रित किये जाते हैं। इसके विपरीत द्वितीयक समंक वे समक है जो अनुसन्धान कर्ता द्वारा स्वयं संकलित नहीं किये जाते बल्कि पहले से संकलित होते हैं।

(2) प्राथमिक समंक मौलिक होते हैं, क्योंकि इनका प्रयोग अनुसन्धानकर्ता द्वारा प्रथम बार किया जाता है। इसके विपरीत, द्वितीयक समंकों में मौलिकता नहीं पायी जाती है, क्योंकि द्वितीयक समंक सांख्यिकीय यन्त्रों से लेकर एक बार गुजर चुकते हैं।

((3) प्राथमिक समंक अनुसन्धान के उद्देश्य के प्रतिकूल होते हैं, जबकि द्वितीयक समक अनुसन्धान के उद्देश्य के पूर्णतया अनुकूल नहीं होते हैं, क्योंकि द्वितीयक समंक किसी अन्य उद्देश्य से एकत्रित किये जाते हैं।

(4) प्राथमिक समंक अनुसन्धानकर्ता द्वारा किसी भी रीति से स्वयं संकलित किये जाते हैं, क्योंकि द्वितीयक समंक अन्य अनुसन्धानकर्ता द्वारा किसी भी रीति से स्वयं संकलित किये जाते हैं, क्योंकि द्वितीयक समंक अन्य अनुसन्धानकर्ता द्वारा पहले से ही संकलित रहते हैं।

(5) प्राथमिक समंक के संकलन में समय, धन एवं श्रम का अधिक व्यय होता है, जबकि द्वितीयक समंक कम व्यय से आसानी से पत्र-पत्रिकाओं और अन्य प्रकाशनों में उपलब्ध हो जाते हैं।

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